सोमवार, 7 नवंबर 2022

आरती कीजै हनुमान लला की|दुष्ट दलन रघुनाथ कला की||टेक||जाके बल से गिरवर काँपे|रोग दोष जाके निकट ना झाँके||अंजनि पुत्र महा बलदाई|संतन के प्रभु सदा सहाई||दे बीरा रघुनाथ पठाये|लंका जारि सिया सुधि लाये||लंका सो कोट समुद्र सी खाई|जात पवनसुत बार न लाई||लंका जारि असुर संहारे|सियाराम जी के काज सँवारे||लक्ष्मण मुर्छित पडे़ सकारे|आनि संजीवन प्राण उबारे||पैठि पाताल तोरि जम कारे|अहिरावन की भुजा उखारे||बायें भुजा असुर दल मारे|दहिने भुजा सब संत जन उबारे||सुर नर मुनि (जन) आरती उतारे|जै जै जै हनुमान उचारे||कचंन थार कपूर लौ छाई|आरती करत अंजना माई||जो हनुमान जी की आरती गावैं|बसि बैकुंठ परम पद पावैं||लंक विध्वंस किये रघुराई|तुलसीदास स्वामी किर्ती गाई||आरती कीजै हनुमान लला की|दुष्ट दलन रघुनाथ कला की||

आरती कीजै हनुमान लला की|
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की||टेक||

जाके बल से गिरवर काँपे|
रोग दोष जाके निकट ना झाँके||

अंजनि पुत्र महा बलदाई|
संतन के प्रभु सदा सहाई||

दे बीरा रघुनाथ पठाये|
लंका जारि सिया सुधि लाये||

लंका सो कोट समुद्र सी खाई|
जात पवनसुत बार न लाई||

लंका जारि असुर संहारे|
सियाराम जी के काज सँवारे||

लक्ष्मण मुर्छित पडे़ सकारे|
आनि संजीवन प्राण उबारे||

पैठि पाताल तोरि जम कारे|
अहिरावन की भुजा उखारे||

बायें भुजा असुर दल मारे|
दहिने भुजा सब संत जन उबारे||

सुर नर मुनि (जन) आरती उतारे|
जै जै जै हनुमान उचारे||

कचंन थार कपूर लौ छाई|
आरती करत अंजना माई||

जो हनुमान जी की आरती गावैं|
बसि बैकुंठ परम पद पावैं||

लंक विध्वंस किये रघुराई|
तुलसीदास स्वामी किर्ती गाई||

आरती कीजै हनुमान लला की|
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की||


शनिवार, 20 अगस्त 2022

श्री कृष्ण जी की आरती ॐ जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय श्री कृष्ण हरे|भक्तन के दुख सारे पल में दूर करे||जय जय श्री कृष्ण हरे....परमानन्द मुरारी मोहन गिरधारी|जय रस रास बिहारी जय जय गिरधारी||जय जय श्री कृष्ण हरे....कर कंकन कटि सोहत कानन में बाला|मोर मुकुट पीताम्बर सोहे बनमाला||जय जय श्री कृष्ण हरे....दीन सुदामा तारे दरिद्रों के दुख टारे|गज के फ़ंद छुड़ाए भव सागर तारे||जय जय श्री कृष्ण हरे....हिरण्यकश्यप संहारे नरहरि रुप धरे|पाहन से प्रभु प्रगटे जम के बीच परे||जय जय श्री कृष्ण हरे....केशी कंस विदारे नल कूबर तारे|दामोदर छवि सुन्दर भगतन के प्यारे||जय जय श्री कृष्ण हरे....काली नाग नथैया नटवर छवि सोहे|फन-फन नाचा करते नागन मन मोहे||जय जय श्री कृष्ण हरे....उग्रसेन राज्य पाये माता शोक हरे|द्रुपद सुता पत राखी करुणा लाज भरे||जय जय श्री कृष्ण हरे....ॐ जय श्री कृष्ण हरे|

श्री कृष्ण जी की आरती  ॐ जय श्री कृष्ण हरे, प्रभु जय श्री कृष्ण हरे|

भक्तन के दुख सारे पल में दूर करे||
जय जय श्री कृष्ण हरे....

परमानन्द मुरारी मोहन गिरधारी|
जय रस रास बिहारी जय जय गिरधारी||
जय जय श्री कृष्ण हरे....

कर कंकन कटि सोहत कानन में बाला|
मोर मुकुट पीताम्बर सोहे बनमाला||
जय जय श्री कृष्ण हरे....

दीन सुदामा तारे दरिद्रों के दुख टारे|
गज के फ़ंद छुड़ाए भव सागर तारे||
जय जय श्री कृष्ण हरे....

हिरण्यकश्यप संहारे नरहरि रुप धरे|
पाहन से प्रभु प्रगटे जम के बीच परे||
जय जय श्री कृष्ण हरे....

केशी कंस विदारे नल कूबर तारे|
दामोदर छवि सुन्दर भगतन के प्यारे||
जय जय श्री कृष्ण हरे....

काली नाग नथैया नटवर छवि सोहे|
फन-फन नाचा करते नागन मन मोहे||
जय जय श्री कृष्ण हरे....

उग्रसेन राज्य पाये माता शोक हरे|
द्रुपद सुता पत राखी करुणा लाज भरे||
जय जय श्री कृष्ण हरे....

ॐ जय श्री कृष्ण हरे|

श्री कुंजबिहारी जी की आरतीआरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की|| गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला|श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला|गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली|लतन में ठाढ़े बनमाली,भ्रमर सी अलक,कस्तूरी तिलक,चंद्र सी झलक,ललित छवि श्यामा प्यारी की||श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की...कनकमय मोर-मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं|गगन सों सुमन रासि बरसै,बजे मुरचंग,मधुर मिरदंग,ग्वालिन संग,अतुल रति गोप कुमारी की||श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की...जहां ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्रीगंगा ।स्मरन ते होत मोह भंगा,बसी सिव सीस,जटा के बीच,हरै अघ कीच,चरन छवि श्रीबनवारी की||श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की...चमकती उज्ज्वल तट रेनू (रेणू), बज रही वृंदावन बेनू (बेणू)।चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू,हंसत मृदु मंद,चांदनी चंद,कटत भव-फंद,टेर सुन दीन भिखारी की||श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की...आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की||आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की||

श्री कुंजबिहारी जी की आरतीआरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की|| 



गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला|
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला|
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली|
लतन में ठाढ़े बनमाली,
भ्रमर सी अलक,
कस्तूरी तिलक,
चंद्र सी झलक,
ललित छवि श्यामा प्यारी की||
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की...

कनकमय मोर-मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं|
गगन सों सुमन रासि बरसै,
बजे मुरचंग,
मधुर मिरदंग,
ग्वालिन संग,
अतुल रति गोप कुमारी की||
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की...

जहां ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्रीगंगा ।
स्मरन ते होत मोह भंगा,
बसी सिव सीस,
जटा के बीच,
हरै अघ कीच,
चरन छवि श्रीबनवारी की||
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की...

चमकती उज्ज्वल तट रेनू (रेणू), बज रही वृंदावन बेनू (बेणू)।
चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू,
हंसत मृदु मंद,
चांदनी चंद,
कटत भव-फंद,
टेर सुन दीन भिखारी की||
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की...

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की||
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की||

(श्री रघुवर जी की आरती) आरती कीजै श्री रघुवर जी की|सत् चित आनन्द शिव सुन्दर की||टेक||दशरथ तनय कौशल्या नन्दन|सुर मुनि रक्षक दैत्य निकन्दन||आरती कीजै०||अनुगत भक्त भक्त उर चन्दन|मर्यादा पुरुषोतम वर की||आरती कीजै०||निर्गुण सगुण अनूप रूप निधि|सकल लोक वन्दित विभिन्न विधि||आरती कीजै०||हरण शोक-भय दायक नव निधि|माया रहित दिव्य नर वर की||आरती कीजै०||जानकी पति सुर अधिपति जगपति|अखिल लोक पालक त्रिलोक गति||आरती कीजै०||विश्‍व वन्द्य अवन्ह अमित गति|एक मात्र गति सचराचर की||आरती कीजै०||शरणागत वत्सल व्रतधारी|भक्त कल्प तरुवर असुरारी||आरती कीजै०||नाम लेत जग पावनकारी|वानर सखा दीन दुख हर की||आरती कीजै श्री रघुवर जी की|सत् चित आनन्द शिव सुन्दर की||


                  (श्री रघुवर जी की आरती)
आरती कीजै श्री रघुवर जी की|
सत् चित आनन्द शिव सुन्दर की||टेक||

दशरथ तनय कौशल्या नन्दन|
सुर मुनि रक्षक दैत्य निकन्दन||
आरती कीजै०||

अनुगत भक्त भक्त उर चन्दन|
मर्यादा पुरुषोतम वर की||
आरती कीजै०||

निर्गुण सगुण अनूप रूप निधि|
सकल लोक वन्दित विभिन्न विधि||
आरती कीजै०||

हरण शोक-भय दायक नव निधि|
माया रहित दिव्य नर वर की||
आरती कीजै०||

जानकी पति सुर अधिपति जगपति|
अखिल लोक पालक त्रिलोक गति||
आरती कीजै०||

विश्‍व वन्द्य अवन्ह अमित गति|
एक मात्र गति सचराचर की||
आरती कीजै०||

शरणागत वत्सल व्रतधारी|
भक्त कल्प तरुवर असुरारी||
आरती कीजै०||

नाम लेत जग पावनकारी|
वानर सखा दीन दुख हर की||

आरती कीजै श्री रघुवर जी की|
सत् चित आनन्द शिव सुन्दर की||

श्री रामचन्द्र जी की आरती श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन, हरण भवभय दारुणम्|नव कंज लोचन, कंज-मुख कर-कंज पद-कंजारुणम्||कन्दर्प अगणित अमित छवि, नव नील नीरद सुन्दरम्|पटपीत मानहुं तड़ित रूचि-शुचि नोमि जनक सुतावरम्||भजु दीनबंधु दिनेश दानव दैत्य वंश निकन्दनम्|रघुनन्द आनन्दकन्द कौशलचन्द दशरथ-नंदनम||सिर मुकुट कुंडल तिलक चारू उदारु अंग विभूषणम्|आजानुभुज शर चाप-धर, संग्राम जित खरदूषणम्||इति वदति तुलसीदास शंकर-शेष-मुनि-मन-रंजनम्।मम ह्रदय कंज निवास कुरु, कामादि खल दल गंजनम्॥मन जाहि राचेऊ मिलहि सो वर सहज सुन्दर सांवरो|करुणा निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो||एहि भांति गौरी असीस सुन सिय सहित हिय हरषीं अली|तुलसी भावानिह पूजी पुनि-पुनि मुदित मन मन्दिर चली||

श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन, हरण भवभय दारुणम्|नव कंज लोचन, कंज-मुख कर-कंज पद-कंजारुणम्||कन्दर्प अगणित अमित छवि, नव नील नीरद सुन्दरम्|पटपीत मानहुं तड़ित रूचि-शुचि नोमि जनक सुतावरम्||भजु दीनबंधु दिनेश दानव दैत्य वंश निकन्दनम्|रघुनन्द आनन्दकन्द कौशलचन्द दशरथ-नंदनम||सिर मुकुट कुंडल तिलक चारू उदारु अंग विभूषणम्|आजानुभुज शर चाप-धर, संग्राम जित खरदूषणम्||इति वदति तुलसीदास शंकर-शेष-मुनि-मन-रंजनम्।मम ह्रदय कंज निवास कुरु, कामादि खल दल गंजनम्॥मन जाहि राचेऊ मिलहि सो वर सहज सुन्दर सांवरो|करुणा निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो||एहि भांति गौरी असीस सुन सिय सहित हिय हरषीं अली|तुलसी भावानिह पूजी पुनि-पुनि मुदित मन मन्दिर चली||

श्री शिव जी की आरतीॐ जय शिव ओंकारा, प्रभु हर शिव ओंकारा|ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा||ॐ जय शिव ओंकारा...एकानन चतुरानन पंचानन राजे|हंसासन, गरुड़ासन, वृषवाहन साजे||ॐ जय शिव ओंकारा......दो भुज चार चतुर्भज दस भुज अति सोहे|तीनों रुप निरखता त्रिभुवन जन मोहे||ॐ जय शिव ओंकारा......अक्षमाला, वनमाला, मुण्डमाला धारी|चंदन मृदमद सोहे, भोले त्रिपुरारी||ॐ जय शिव ओंकारा......श्वेताम्बर, पीताम्बर, बाघाम्बर अंगे|सनकादिक, ब्रह्मादिक, भूतादिक संगे|ॐ जय शिव ओंकारा......कर के मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूल धरता|सुखकर्ता, दुखः हर्ता, जगपालन करता||ॐ जय शिव ओंकारा......ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका|प्रणवाक्षर के मध्ये तीनो ही एका||ॐ जय शिव ओंकारा......त्रिगुण स्वामी जी की आरती जो कोई नर गावे|कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावे||ॐ जय शिव ओंकारा.....#Vnita ॐ जय शिव ओंकारा, प्रभु हर शिव ओंकारा|ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा||ॐ जय शिव ओंकारा...

श्री शिव जी की आरती

ॐ जय शिव ओंकारा, प्रभु हर शिव ओंकारा|
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा||
ॐ जय शिव ओंकारा...

एकानन चतुरानन पंचानन राजे|
हंसासन, गरुड़ासन, वृषवाहन साजे||
ॐ जय शिव ओंकारा......

दो भुज चार चतुर्भज दस भुज अति सोहे|
तीनों रुप निरखता त्रिभुवन जन मोहे||
ॐ जय शिव ओंकारा......

अक्षमाला, वनमाला, मुण्डमाला धारी|
चंदन मृदमद सोहे, भोले त्रिपुरारी||
ॐ जय शिव ओंकारा......

श्वेताम्बर, पीताम्बर, बाघाम्बर अंगे|
सनकादिक, ब्रह्मादिक, भूतादिक संगे|
ॐ जय शिव ओंकारा......

कर के मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूल धरता|
सुखकर्ता, दुखः हर्ता, जगपालन करता||
ॐ जय शिव ओंकारा......

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका|
प्रणवाक्षर के मध्ये तीनो ही एका||
ॐ जय शिव ओंकारा......

त्रिगुण स्वामी जी की आरती जो कोई नर गावे|
कहत शिवानंद स्वामी मनवांछित फल पावे||
ॐ जय शिव ओंकारा.....
#Vnita
ॐ जय शिव ओंकारा, प्रभु हर शिव ओंकारा|
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा||
ॐ जय शिव ओंकारा...

श्री विष्णु जी की आरतीॐ जय जगदीश हरे, प्रभु! जय जगदीश हरे| भक्तजनों के संकट, क्षण में दूर करे||ॐ जय जगदीश हरे||जो ध्यावै फल पावै, दु:ख बिनसै मनका|सुख सम्पत्ति घर आवै, कष्ट मिटै तनका||ॐ जय जगदीश हरे||मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ किसकी|तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी||ॐ जय जगदीश हरे||तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतर्यामी|पार ब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी||ॐ जय जगदीश हरे||तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता|मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता||ॐ जय जगदीश हरे||तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति|किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमती||ॐ जय जगदीश हरे||दीनबन्धु, दु:खहर्ता तुम ठाकुर मेरे|अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा (मैं) तेरे||ॐ जय जगदीश हरे||विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा|श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा||ॐ जय जगदीश हरे||ॐ जय जगदीश हरे, प्रभु! जय जगदीश हरे|भक्तजनों के संकट, क्षण में दूर करे||ॐ जय जगदीश हरे||

श्री विष्णु जी की आरती
ॐ जय जगदीश हरे, प्रभु! जय जगदीश हरे|
भक्तजनों के संकट, क्षण में दूर करे||
ॐ जय जगदीश हरे||

जो ध्यावै फल पावै, दु:ख बिनसै मनका|
सुख सम्पत्ति घर आवै, कष्ट मिटै तनका||
ॐ जय जगदीश हरे||

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ किसकी|
तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी||
ॐ जय जगदीश हरे||

तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतर्यामी|
पार ब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी||
ॐ जय जगदीश हरे||

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता|
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता||
ॐ जय जगदीश हरे||

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति|
किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमती||
ॐ जय जगदीश हरे||

दीनबन्धु, दु:खहर्ता तुम ठाकुर मेरे|
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा (मैं) तेरे||
ॐ जय जगदीश हरे||

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा|
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा||
ॐ जय जगदीश हरे||

ॐ जय जगदीश हरे, प्रभु! जय जगदीश हरे|
भक्तजनों के संकट, क्षण में दूर करे||
ॐ जय जगदीश हरे||

श्री सत्यनारायण जी की आरतीॐ जय लक्ष्मीरमणा, स्वामी जय लक्ष्मीरमणा|सत्यनारायण स्वामी, जन पातक हरणा||टेक||रत्नजटित सिंहासन, अद्भुत छवि राजै|नारद करत निराजन घंटा ध्वनी बाजै||ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी....प्रकट भयें कलिकारण, द्विज को दरस दियो|बूढों ब्राह्मण बनके, कंचन महल कियो||ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी.....दुर्बल भील कठारो, जिन पर कृपा करी|च्रंदचूड़ एक राजा, तिनकी बिपति हरी||ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी.....वैश्य मनोरथ पायो, श्रद्धा तज दिन्हीं|सो फल भोग्यो प्रभूजी, फेर अस्तुति किन्हीं||ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी.....भाव भक्ति के कारण, छिन-छिन रुप धरयो|श्रद्धा धारण कीनी, तिनको काज सरयो||ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी.....ग्वाल बाल संग राजा, वन में भक्ति करी|मनवांचित फल दिन्हों, दीन दयालु हरि||ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी.....चढ़त प्रसाद सवायो, कदली फल मेवा|धूप दीप तुलसी से, राजी सत्य देवा||ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी.....सत्यनारायणजी की आरती जो कोई नर गावे|तन-मन-सुख-संपत्ति, मन-वांछित फल पावै||ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी.....By वनिता कासनियां पंजाब चॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी जय लक्ष्मीरमणा|सत्यनारायण स्वामी, जन पातक हरणा||

श्री सत्यनारायण जी की आरती
ॐ जय लक्ष्मीरमणा, स्वामी जय लक्ष्मीरमणा|
सत्यनारायण स्वामी, जन पातक हरणा||टेक||

रत्नजटित सिंहासन, अद्भुत छवि राजै|
नारद करत निराजन घंटा ध्वनी बाजै||
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी....

प्रकट भयें कलिकारण, द्विज को दरस दियो|
बूढों ब्राह्मण बनके, कंचन महल कियो||
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी.....

दुर्बल भील कठारो, जिन पर कृपा करी|
च्रंदचूड़ एक राजा, तिनकी बिपति हरी||
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी.....

वैश्य मनोरथ पायो, श्रद्धा तज दिन्हीं|
सो फल भोग्यो प्रभूजी, फेर अस्तुति किन्हीं||
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी.....

भाव भक्ति के कारण, छिन-छिन रुप धरयो|
श्रद्धा धारण कीनी, तिनको काज सरयो||
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी.....

ग्वाल बाल संग राजा, वन में भक्ति करी|
मनवांचित फल दिन्हों, दीन दयालु हरि||
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी.....

चढ़त प्रसाद सवायो, कदली फल मेवा|
धूप दीप तुलसी से, राजी सत्य देवा||
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी.....

सत्यनारायणजी की आरती जो कोई नर गावे|
तन-मन-सुख-संपत्ति, मन-वांछित फल पावै||
ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी.....


ॐ जय लक्ष्मीरमणा स्वामी जय लक्ष्मीरमणा|
सत्यनारायण स्वामी, जन पातक हरणा||

श्री गणेश आरती (मराठी सुख करता दुखहर्ता, वार्ता विघ्नाचीनूर्वी पूर्वी प्रेम कृपा जयाचीसर्वांगी सुन्दर उटी शेंदु राचीकंठी झलके माल मुकताफळांचीजय देव जय देव, जय मंगल मूर्तिदर्शनमात्रे मनकामना पूर्तिजय देव जय देवरत्नखचित फरा तुझ गौरीकुमराचंदनाची उटी कुमकुम केशराहीरे जडित मुकुट शोभतो बरारुन्झुनती नूपुरे चरनी घागरियाजय देव जय देव, जय मंगल मूर्तिदर्शनमात्रे मनकामना पूर्तिजय देव जय देवलम्बोदर पीताम्बर फनिवर वंदनासरल सोंड वक्रतुंड त्रिनयनादास रामाचा वाट पाहे सदनासंकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुरवर वंदनाजय देव जय देव, जय मंगल मूर्तिदर्शनमात्रे मनकामना पूर्तिजय देव जय देवशेंदुर लाल चढायो अच्छा गजमुख कोदोन्दिल लाल बिराजे सूत गौरिहर कोहाथ लिए गुड लड्डू साई सुरवर कोमहिमा कहे ना जाय लागत हूँ पद कोजय जय जय जय जयजय जय जी गणराज विद्यासुखदाताधन्य तुम्हारो दर्शन मेरा मन रमताजय देव जय देवअष्ट सिधि दासी संकट को बैरीविघन विनाशन मंगल मूरत अधिकारीकोटि सूरज प्रकाश ऐसे छबी तेरीगंडस्थल मद्मस्तक झूल शशि बहरीजय जय जय जय जयजय जय जी गणराज विद्यासुखदाताधन्य तुम्हारो दर्शन मेरा मन रमताजय देव जय देवभावभगत से कोई शरणागत आवेसंतति संपत्ति सबही भरपूर पावेऐसे तुम महाराज मोको अति भावेगोसावीनंदन निशिदिन गुण गावे वनिता कासनियां पंजाब जय जय जी गणराज विद्यासुखदाताधन्य तुम्हारो दर्शन मेरा मन रमताजय देव जय देव



सुख करता दुखहर्ता, वार्ता विघ्नाची
नूर्वी पूर्वी प्रेम कृपा जयाची
सर्वांगी सुन्दर उटी शेंदु राची
कंठी झलके माल मुकताफळांची

जय देव जय देव, जय मंगल मूर्ति
दर्शनमात्रे मनकामना पूर्ति
जय देव जय देव

रत्नखचित फरा तुझ गौरीकुमरा
चंदनाची उटी कुमकुम केशरा
हीरे जडित मुकुट शोभतो बरा
रुन्झुनती नूपुरे चरनी घागरिया

जय देव जय देव, जय मंगल मूर्ति
दर्शनमात्रे मनकामना पूर्ति
जय देव जय देव

लम्बोदर पीताम्बर फनिवर वंदना
सरल सोंड वक्रतुंड त्रिनयना
दास रामाचा वाट पाहे सदना
संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुरवर वंदना

जय देव जय देव, जय मंगल मूर्ति
दर्शनमात्रे मनकामना पूर्ति
जय देव जय देव

शेंदुर लाल चढायो अच्छा गजमुख को
दोन्दिल लाल बिराजे सूत गौरिहर को
हाथ लिए गुड लड्डू साई सुरवर को
महिमा कहे ना जाय लागत हूँ पद को

जय जय जय जय जय
जय जय जी गणराज विद्यासुखदाता
धन्य तुम्हारो दर्शन मेरा मन रमता
जय देव जय देव

अष्ट सिधि दासी संकट को बैरी
विघन विनाशन मंगल मूरत अधिकारी
कोटि सूरज प्रकाश ऐसे छबी तेरी
गंडस्थल मद्मस्तक झूल शशि बहरी

जय जय जय जय जय
जय जय जी गणराज विद्यासुखदाता
धन्य तुम्हारो दर्शन मेरा मन रमता
जय देव जय देव

भावभगत से कोई शरणागत आवे
संतति संपत्ति सबही भरपूर पावे
ऐसे तुम महाराज मोको अति भावे
गोसावीनंदन निशिदिन गुण गावे


जय जय जी गणराज विद्यासुखदाता
धन्य तुम्हारो दर्शन मेरा मन रमता
जय देव जय देव

श्री गणेश आरती (हिन्दी) By वनिता कासनियां पंजाब जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥एकदन्त दयावन्त चारभुजाधारी।माथे पर तिलक सोहे मूसे की सवारी॥(माथे पर सिन्दूर सोहे, मूसे की सवारी)पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा।(हार चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा)लड्डुअन का भोग लगे सन्त करें सेवा॥जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥अँधे को आँख देत कोढ़िन को काया।बाँझन को पुत्र देत निर्धन को माया॥'सूर' श्याम शरण आए सफल कीजे सेवा।माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥(दीनन की लाज राखो, शम्भु सुतवारी )(कामना को पूर्ण करो, जग बलिहारी॥)जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

श्री गणेश आरती (हिन्दी)

By वनिता कासनियां पंजाब


जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

एकदन्त दयावन्त चारभुजाधारी।
माथे पर तिलक सोहे मूसे की सवारी॥
(माथे पर सिन्दूर सोहे, मूसे की सवारी)

पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
(हार चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा)
लड्डुअन का भोग लगे सन्त करें सेवा॥

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

अँधे को आँख देत कोढ़िन को काया।
बाँझन को पुत्र देत निर्धन को माया॥

'सूर' श्याम शरण आए सफल कीजे सेवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
(दीनन की लाज राखो, शम्भु सुतवारी )
(कामना को पूर्ण करो, जग बलिहारी॥)

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

गुरुवार, 21 जुलाई 2022

Horoscope,Is there any other way apart from looking at the horoscope so that we can know which planet is bad in our horoscope and we can take measures related to it?,By Vanitha Kasaniyan PunjabPeople who know enough about astrology

जो लोग ज्योतिष का पर्याप्त ज्ञान रखते हैं ज्योतिष का अच्छा अनुभव रखने वाले लोगों के लिए कुंडली देखना भी इतना जरूरी नहीं होता है वह समस्या को देख कर ही समझ जाते हैं कि कौन से ग्रह से व्यक्ति पीड़ित हैं उसके हिसाब से वे ग्रहों का उपाय भी बताते हैं जिससे जातक को राहत महसूस होती है।

बुधवार, 11 मई 2022

धरती के पास अपनी बुद्धि है, वो उसके हिसाब से करती है बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम की अध्यक्ष श्रीमती वनिता कासनियां पंजाब द्वाराSubscribe to NotificationsEarth Has its own Brain1/14वैज्ञानिकों के एक समूह ने ऐसा खुलासा किया है, जिससे आपका दिमाग हिल जाएगा. इनका दावा है कि धरती (Earth) की अपनी बुद्धि है. उसका अपना दिमाग और बुद्धिमत्ता है. वह एक इंटेलिजेंट ग्रह है. यानी धरती जीवित है. यह स्टडी हाल ही में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एस्ट्रोबायोलॉजी में प्रकाशित हुई है. जिसमें ग्रहीय बुद्धिमत्ता (Planetary Intelligence) की बात कही गई है. यानी ग्रह के पूरे ज्ञान और तार्किक क्षमता की चर्चा की गई है. (फोटोः गेटी)Earth Has its own Brain2/14सबूत के तौर पर साइंटिस्ट बताते हैं कि जमीन के नीचे फंगस (Fungus) की एक विशालकाय परत है. जो पूरी धरती में फैली हुई है. ये आपस में संदेशों का आदान-प्रदान करती हैं. इनका एक बड़ा नेटवर्क है. यह एक अदृश्य बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन करती हैं. जिसकी वजह से पूरी धरती की स्थितियां बदलती रहती हैं. अगर इस तरह की प्रक्रियाओं को पकड़कर उनकी जांच की जाए तो हम जलवायु परिवर्तन (Climate Change), वैश्विक गर्मी (Global Warming) जैसी घटनाओं पर धरती की प्रतिक्रया को समझ सकते हैं. (फोटोः गेटी)Earth Has its own Brain3/14हमारी पृथ्वी पर शुरुआती जीवन यानी फंगस जैसे जीवों से लेकर इंसानों जैसे जटिल जीव मौजूद हैं. इंसानों द्वारा निर्मित पर्यावरण प्रदूषण से लेकर प्लास्टिक संकट तक की गवाह रही है हमारी धरती. वह लगातार किसी न किसी तरीके से संतुलन बनाने के लिए किसी न किसी तरह की प्रक्रियाओं को जन्म देती रहती है. अमेरिका स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ रोचेस्टर में फिजिक्स के प्रोफेसर एडम फ्रैंक ने कहा कि इंसान अभी तक धरती की भलाई के लिए सामुदायिक स्तर पर नहीं जुट पाया है. जैसे वह त्योहारों के लिए साथ आता है. या फिर बीमारियों के खिलाफ होता है. (फोटोः गेटी)Earth Has its own Brain4/14उदाहरण के लिए आप ऐसे समझ सकते हैं. मान लीजिए पेड़-पौधे एक समुदाय हैं. उन्होंने खुद को जीवित रखने के लिए वैश्विक स्तर पर एक प्रक्रिया शुरू की. जिसे फोटोसिंथेसिस (Photosynthesis) कहते हैं. प्रक्रिया सामुदायिक स्तर पर पूरी धरती पर हो रही है. बदले में क्या मिला...Oxygen. बस फिर क्या था. ऑक्सीजन ने हमारी धरती की पूरी प्रक्रिया को ही बदल दिया. असल में पेड़-पौधे काम तो अपने लिए कर रहे हैं, लेकिन वो धरती की बुद्धिमत्ता का एक हिस्सा हैं. (फोटोः गेटी)Earth Has its own Brain5/14धरती पर मौजूद जीवन को अगर सामूहिक तौर पर देखा जाता है, तो उसे बायोस्फेयर (Biosphere) कहते हैं. यही है जो धरती की बुद्धिमत्ता, दिमाग, ब्रेन, तार्किक शक्ति और संज्ञान को दर्शाता है. जैसे ही बायोस्फेयर का जन्म हुआ, धरती को एक नया जीवन मिल गया. धरती खुद से अपने बारे में सोचने लगी. वह संतुलन बनाने लगी. जब धरती पर किसी एक कोने में कुछ गड़बड़ होता है, तो दूसरे कोने में वह कुछ ऐसा कर देती है, जिससे संतुलन बन जाता है. (फोटोः गेटी)Earth Has its own Brain6/14स्टडी में शामिल यूनिवर्सिटी ऑफ रोचेस्टर में फिजिक्स एंड एस्ट्रोनॉमी के प्रोफेसर एडम फ्रैंक, हेलेन एफ, फ्रेड एच. गोवेन, प्लैनेटरी साइंस इंस्टीट्यूट के डेविड ग्रिन्स्पून और एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी की सारा वॉकर शामिल हैं. स्टडी करते समय इन वैज्ञानिकों ने बस यह ध्यान दिया कि बायोस्फेयर कैसे धरती को बदल रहा है. धरती किस तरह से बदलाव पर प्रतिक्रिया दे रही है. वह किसी तरह से संतुलन बनाने का प्रयास कर रही है. इसे समझाने के लिए वैज्ञानिकों ने चार स्टेज गिनाए हैं...(फोटोः गेटी)Earth Has its own Brain7/14अपरिपक्व जीवमंडल (Immature Biosphere)करोड़ों साल पहले धरती पर जीवन नहीं था. तकनीक नहीं थी. सूक्ष्मजीव यानी माइक्रोब्स थे लेकिन पेड़-पौधे नहीं थे. उनका आना बाकी था. धरती इस तरह का जीवन नहीं था, जो उसके वायुमंडल, जल मंडल या फिर अन्य ग्रहीय ताकतों पर असल डाल पाता. इसलिए इस समय को अपरिपक्व जीवमंडल कहा जाता है. (फोटोः इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एस्ट्रोबायोलॉजी)Earth Has its own Brain8/14परिपक्व जीवमंडल (Mature Biosphere)ये है आज की धरती का असली चेहरा. यानी उसका चरित्र. इस समय जैविक और टेक्नोलॉजिकल प्रजातियां मौजूद हैं. इसकी शुरुआत 250 करोड़ साल से लेकर 54 करोड़ साल के बीच शुरु हुई. महाद्वीप बने. पेड़-पौधों की शुरुआत हुई. फोटोसिंथेसिस की प्रक्रिया शुरू हुई. ऑक्सीजन बना. वायुमंडल शुरू हुआ. ओजोन लेयर बनी. बायोस्फेयर बनता रहा. जिसकी वजह से धरती के वायुमंडल पर असर पड़ने लगा. धरती पर इसका असर पड़ने लगा. (फोटोः इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एस्ट्रोबायोलॉजी)Earth Has its own Brain9/14अपरिपक्व तकनीकी मंडल (Immature Technosphere)धरती के अपरिपक्व जीवमंडल की तरह हम इस समय तकनीकी मंडल के अपरिपक्व काल में जी रहे हैं. यानी धरती पर संचार है, यातायात है. तकनीकें हैं. बिजली है. कंप्यूटर्स हैं. आपस में जुड़े भी हैं. लेकिन यह अभी अपरिपक्व है. लेकिन ये सारे किसी न किसी रूप में धरती से ऊर्जा ले रहे हैं. लेकिन अपनी तरफ से कोई फायदा धरती को नहीं दे रहे हैं. बल्कि नुकसान ही पहुंचा रहे हैं. लंबे समय में यह तकनीकी मंडल खुद का विनाश करेगा. अगर यह पृथ्वी के लिए फायदेमंद नहीं हुआ तो. (फोटोः इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एस्ट्रोबायोलॉजी)Earth Has its own Brain10/14परिपक्व तकनीकी मंडल (Mature Technosphere)यह उस समय की बात हो रही है, जब धरती भविष्य में होगी. एडम फ्रैंक बताते हैं कि सभी टेक्नोलॉजिकल सिस्टम धरती को लाभ पहुंचाएंगे. वैश्विक रूप से जितना धरती से लेंगे, उससे कहीं ज्यादा धरती को वापस करेंगे. यानी सिंबियोटिक रिश्ता निभाएंगे. एक दूसरे के लिए सपोर्ट बनेंगे. तब जाकर परिपक्व तकनीकी मंडल का निर्माण होगा. (फोटोः इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एस्ट्रोबायोलॉजी)Earth Has its own Brain11/14एडम फ्रैंक ने कहा कि ग्रह हमेशा परिपक्व और अपरिपक्व स्थितियों से गुजरते हुए ही विकसित होता है. किसी भी ग्रह की बुद्धिमत्ता तभी बनती है जब उसके चारों तरफ मैच्योर यानी परिपक्व सिस्टम काम कर रहे हों. जैसे हमारा जीवमंडल (Biosphere). बड़ा सवाल ये है कि हम मैच्योर बायोस्फेयर तक तो पहुंच गए लेकिन मैच्योर टेक्नोस्फेयर तक कैसे पहुंचे, इसका अंदाजा अभी तक हम इंसानों को नहीं हो पाया है. (फोटोः गेटी)Earth Has its own Brain12/14धरती की बुद्धिमत्ता एक बेहद जटिल सिस्टम है. सवाल ये भी उठता है कि किसी ग्रह की बुद्धिमत्ता खुद को कैसे चलाती है. मैच्योर टेक्नोस्फेयर यानी धरती पर मौजूद सभी टेक्नोलॉजिकल सिस्टम को किसी तरह से धरती के साथ जोड़ना ताकि हमारी पृथ्वी को इससे फायदा हो. ऐसा न हो कि तकनीकी सिस्टम सिर्फ धरती से फायदा लें. छोटे तकनीकी सिस्टम जैसे- फैशन से संबंधित कोई वस्तु. लेकिन बड़ी और जटिल तकनीकी सिस्टम हैं- जंगल, इंटरनेट, फाइनेंसियल मार्केट और इंसानी दिमाग. (फोटोः गूगल)Earth Has its own Brain13/14एडम कहते हैं कि जब सारे जटिल सिस्टम धरती से जुड़ जाएंगे, तब धरती और ज्यादा स्मार्ट हो जाएगी. इससे फायदा यह होगा कि धरती को होने वाले नुकसान की वजह से इन सिस्टम्स को भी नुकसान होगा. तब वो धरती के हिसाब से काम करेंगे. धरती के साथ-साथ उस पर मौजूद सिस्टम्स को भी यह पता चलेगा कि इस काम से फायदा और इससे नुकसान होगा तब बायोस्फेयर और टेक्नोस्फेयर दोनों मिलकर धरती की भलाई के लिए काम करेंगे. (फोटोः गूगल)Earth Has its own Brain14/14एडम ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ खतरनाक रसायनों को प्रतिबंधित करने और सौर ऊर्जा की तरफ बढ़ने के बजाय हमारे पास किसी भी तरह का मैच्योर टेक्नोस्फेयर अभी नहीं बना है. समस्या ये है कि हम तकनीकी रूप से विकसित तो हो रहे हैं. लेकिन उससे धरती को कोई फायदा नहीं हो रहा है. जब हमारे कंप्यूटर्स, स्मार्टफोन, सैटेलाइट्स, यातायात के साधनों आदि से धरती को फायदा होगा तब मैच्योर टेक्नोस्फेयर बनेगा. धरती और बुद्धिमान हो जाएगी. (फोटोः गूगलेेhttp://vnita45.blogspot.com/2022/05/vnita.html

धरती के पास अपनी बुद्धि है, वो उसके हिसाब से करती है 


वैज्ञानिकों के एक समूह ने ऐसा खुलासा किया है, जिससे आपका दिमाग हिल जाएगा. इनका दावा है कि धरती (Earth) की अपनी बुद्धि है. उसका अपना दिमाग और बुद्धिमत्ता है. वह एक इंटेलिजेंट ग्रह है. यानी धरती जीवित है. यह स्टडी हाल ही में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एस्ट्रोबायोलॉजी में प्रकाशित हुई है. जिसमें ग्रहीय बुद्धिमत्ता (Planetary Intelligence) की बात कही गई है. यानी ग्रह के पूरे ज्ञान और तार्किक क्षमता की चर्चा की गई है. (फोटोः गेटी)

Earth Has its own Brain
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सबूत के तौर पर साइंटिस्ट बताते हैं कि जमीन के नीचे फंगस (Fungus) की एक विशालकाय परत है. जो पूरी धरती में फैली हुई है. ये आपस में संदेशों का आदान-प्रदान करती हैं. इनका एक बड़ा नेटवर्क है. यह एक अदृश्य बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन करती हैं. जिसकी वजह से पूरी धरती की स्थितियां बदलती रहती हैं. अगर इस तरह की प्रक्रियाओं को पकड़कर उनकी जांच की जाए तो हम जलवायु परिवर्तन (Climate Change), वैश्विक गर्मी (Global Warming) जैसी घटनाओं पर धरती की प्रतिक्रया को समझ सकते हैं. (फोटोः गेटी)

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हमारी पृथ्वी पर शुरुआती जीवन यानी फंगस जैसे जीवों से लेकर इंसानों जैसे जटिल जीव मौजूद हैं. इंसानों द्वारा निर्मित पर्यावरण प्रदूषण से लेकर प्लास्टिक संकट तक की गवाह रही है हमारी धरती. वह लगातार किसी न किसी तरीके से संतुलन बनाने के लिए किसी न किसी तरह की प्रक्रियाओं को जन्म देती रहती है. अमेरिका स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ रोचेस्टर में फिजिक्स के प्रोफेसर एडम फ्रैंक ने कहा कि इंसान अभी तक धरती की भलाई के लिए सामुदायिक स्तर पर नहीं जुट पाया है. जैसे वह त्योहारों के लिए साथ आता है. या फिर बीमारियों के खिलाफ होता है. (फोटोः गेटी)

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उदाहरण के लिए आप ऐसे समझ सकते हैं. मान लीजिए पेड़-पौधे एक समुदाय हैं. उन्होंने खुद को जीवित रखने के लिए वैश्विक स्तर पर एक प्रक्रिया शुरू की. जिसे फोटोसिंथेसिस (Photosynthesis) कहते हैं. प्रक्रिया सामुदायिक स्तर पर पूरी धरती पर हो रही है. बदले में क्या मिला...Oxygen. बस फिर क्या था. ऑक्सीजन ने हमारी धरती की पूरी प्रक्रिया को ही बदल दिया. असल में पेड़-पौधे काम तो अपने लिए कर रहे हैं, लेकिन वो धरती की बुद्धिमत्ता का एक हिस्सा हैं. (फोटोः गेटी)

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धरती पर मौजूद जीवन को अगर सामूहिक तौर पर देखा जाता है, तो उसे बायोस्फेयर (Biosphere) कहते हैं. यही है जो धरती की बुद्धिमत्ता, दिमाग, ब्रेन, तार्किक शक्ति और संज्ञान को दर्शाता है. जैसे ही बायोस्फेयर का जन्म हुआ, धरती को एक नया जीवन मिल गया. धरती खुद से अपने बारे में सोचने लगी. वह संतुलन बनाने लगी. जब धरती पर किसी एक कोने में कुछ गड़बड़ होता है, तो दूसरे कोने में वह कुछ ऐसा कर देती है, जिससे संतुलन बन जाता है. (फोटोः गेटी)

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स्टडी में शामिल यूनिवर्सिटी ऑफ रोचेस्टर में फिजिक्स एंड एस्ट्रोनॉमी के प्रोफेसर एडम फ्रैंक, हेलेन एफ, फ्रेड एच. गोवेन,  प्लैनेटरी साइंस इंस्टीट्यूट के डेविड ग्रिन्स्पून और एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी की सारा वॉकर शामिल हैं. स्टडी करते समय इन वैज्ञानिकों ने बस यह ध्यान दिया कि बायोस्फेयर कैसे धरती को बदल रहा है. धरती किस तरह से बदलाव पर प्रतिक्रिया दे रही है. वह किसी तरह से संतुलन बनाने का प्रयास कर रही है. इसे समझाने के लिए वैज्ञानिकों ने चार स्टेज गिनाए हैं...(फोटोः गेटी)

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अपरिपक्व जीवमंडल (Immature Biosphere)

करोड़ों साल पहले धरती पर जीवन नहीं था. तकनीक नहीं थी. सूक्ष्मजीव यानी माइक्रोब्स थे लेकिन पेड़-पौधे नहीं थे. उनका आना बाकी था. धरती इस तरह का जीवन नहीं था, जो उसके वायुमंडल, जल मंडल या फिर अन्य ग्रहीय ताकतों पर असल डाल पाता. इसलिए इस समय को अपरिपक्व जीवमंडल कहा जाता है. (फोटोः इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एस्ट्रोबायोलॉजी)

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परिपक्व जीवमंडल (Mature Biosphere)

ये है आज की धरती का असली चेहरा. यानी उसका चरित्र. इस समय जैविक और टेक्नोलॉजिकल प्रजातियां मौजूद हैं. इसकी शुरुआत 250 करोड़ साल से लेकर 54 करोड़ साल के बीच शुरु हुई. महाद्वीप बने. पेड़-पौधों की शुरुआत हुई. फोटोसिंथेसिस की प्रक्रिया शुरू हुई. ऑक्सीजन बना. वायुमंडल शुरू हुआ. ओजोन लेयर बनी. बायोस्फेयर बनता रहा. जिसकी वजह से धरती के वायुमंडल पर असर पड़ने लगा. धरती पर इसका असर पड़ने लगा. (फोटोः इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एस्ट्रोबायोलॉजी)

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अपरिपक्व तकनीकी मंडल (Immature Technosphere)

धरती के अपरिपक्व जीवमंडल की तरह हम इस समय तकनीकी मंडल के अपरिपक्व काल में जी रहे हैं. यानी धरती पर संचार है, यातायात है. तकनीकें हैं. बिजली है. कंप्यूटर्स हैं. आपस में जुड़े भी हैं. लेकिन यह अभी अपरिपक्व है. लेकिन ये सारे किसी न किसी रूप में धरती से ऊर्जा ले रहे हैं. लेकिन अपनी तरफ से कोई फायदा धरती को नहीं दे रहे हैं. बल्कि नुकसान ही पहुंचा रहे हैं. लंबे समय में यह तकनीकी मंडल खुद का विनाश करेगा. अगर यह पृथ्वी के लिए फायदेमंद नहीं हुआ तो. (फोटोः इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एस्ट्रोबायोलॉजी)

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परिपक्व तकनीकी मंडल (Mature Technosphere)

यह उस समय की बात हो रही है, जब धरती भविष्य में होगी. एडम फ्रैंक बताते हैं कि सभी टेक्नोलॉजिकल सिस्टम धरती को लाभ पहुंचाएंगे. वैश्विक रूप से जितना धरती से लेंगे, उससे कहीं ज्यादा धरती को वापस करेंगे. यानी सिंबियोटिक रिश्ता निभाएंगे. एक दूसरे के लिए सपोर्ट बनेंगे. तब जाकर परिपक्व तकनीकी मंडल का निर्माण होगा. (फोटोः इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एस्ट्रोबायोलॉजी)

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एडम फ्रैंक ने कहा कि ग्रह हमेशा परिपक्व और अपरिपक्व स्थितियों से गुजरते हुए ही विकसित होता है. किसी भी ग्रह की बुद्धिमत्ता तभी बनती है जब उसके चारों तरफ मैच्योर यानी परिपक्व सिस्टम काम कर रहे हों. जैसे हमारा जीवमंडल (Biosphere). बड़ा सवाल ये है कि हम मैच्योर बायोस्फेयर तक तो पहुंच गए लेकिन मैच्योर टेक्नोस्फेयर तक कैसे पहुंचे, इसका अंदाजा अभी तक हम इंसानों को नहीं हो पाया है. (फोटोः गेटी)

Earth Has its own Brain
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धरती की बुद्धिमत्ता एक बेहद जटिल सिस्टम है. सवाल ये भी उठता है कि किसी ग्रह की बुद्धिमत्ता खुद को कैसे चलाती है. मैच्योर टेक्नोस्फेयर यानी धरती पर मौजूद सभी टेक्नोलॉजिकल सिस्टम को किसी तरह से धरती के साथ जोड़ना ताकि हमारी पृथ्वी को इससे फायदा हो. ऐसा न हो कि तकनीकी सिस्टम सिर्फ धरती से फायदा लें. छोटे तकनीकी सिस्टम जैसे- फैशन से संबंधित कोई वस्तु. लेकिन बड़ी और जटिल तकनीकी सिस्टम हैं- जंगल, इंटरनेट, फाइनेंसियल मार्केट और इंसानी दिमाग. (फोटोः गूगल)

Earth Has its own Brain
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एडम कहते हैं कि जब सारे जटिल सिस्टम धरती से जुड़ जाएंगे, तब धरती और ज्यादा स्मार्ट हो जाएगी. इससे फायदा यह होगा कि धरती को होने वाले नुकसान की वजह से इन सिस्टम्स को भी नुकसान होगा. तब वो धरती के हिसाब से काम करेंगे. धरती के साथ-साथ उस पर मौजूद सिस्टम्स को भी यह पता चलेगा कि इस काम से फायदा और इससे नुकसान होगा तब बायोस्फेयर और टेक्नोस्फेयर दोनों मिलकर धरती की भलाई के लिए काम करेंगे. (फोटोः गूगल)

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एडम ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ खतरनाक रसायनों को प्रतिबंधित करने और सौर ऊर्जा की तरफ बढ़ने के बजाय हमारे पास किसी भी तरह का मैच्योर टेक्नोस्फेयर अभी नहीं बना है. समस्या ये है कि हम तकनीकी रूप से विकसित तो हो रहे हैं. लेकिन उससे धरती को कोई फायदा नहीं हो रहा है. जब हमारे कंप्यूटर्स, स्मार्टफोन, सैटेलाइट्स, यातायात के साधनों आदि से धरती को फायदा होगा तब मैच्योर टेक्नोस्फेयर बनेगा. धरती और बुद्धिमान हो जाएगी. (फोटोः गूगलेे

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रविवार, 17 अक्टूबर 2021

दुर्गा माँ के अनेक रूप में से एक माँ शैलपुत्री के बारे में आप क्या बता सकते हैं?बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम संगरिया राजस्थान की अध्यक्ष श्रीमती वनिता कासनियां पंजाबनेहा जी प्रश्न के लिए धन्यवाद।आइए देखते हैं देवी माँ का शैलपुत्री नाम कहाँ किस संदर्भ में आया है।दुर्गा सप्तशती के पाठ के आरम्भ में पाठ की सिद्धि सफलता के लिए★ कवच ★कीलक और ★अर्गलाइन तीन का पाठ करने पर जोर दिया गया है।इनमें से प्रथम देव्या कवचम के पाठ से साधक का सम्पूर्ण शरीर सभी प्रकार की बाधाओं से सुरक्षित हो जाता है।इसमें ५६ श्लोक हैं।देवी चण्डिका को नमस्कार के उपरांत इन श्लोकों में से आरंभ के तीसरे चौथे और पांचवें श्लोक में जगदंबिका के नौ नाम दिए हैं:प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्म चारिणी ।तृतीयं चंद्र घण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम।।पञ्चमं स्कन्द मातेति षष्टम कात्यायनीति च।सप्तम कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम ।।नवमं सिद्धिदात्री च नव दुर्गा: प्रकीर्तिताः।उपरोक्त नौ नामों में प्रथम नाम शैलपुत्री है। इसका अर्थ हुआ गिरिराज हिमालय की पुत्री पार्वती।यह हिमालय की तपस्या से प्रसन्न होकर उनकी पुत्री रूप में प्रकट हुईं। इसकी पुराण व्याख्या से इतर अन्य तांत्रिक व्याख्याएं भी हैं।विभिन्न पुराणों में इसका आख्यान है। इसी प्रकार अन्य नामों की भी व्याख्या है।_______________________________★शैलपुत्री पार्वती शिव की अर्धांगिनी हैं , शिव शक्ति के इस संयुक्त स्वरूप की शाक्त शैव दर्शनों में कई तरह से व्याख्या है।★यह शैलपुत्री पार्वती ही आदिशक्ति हैं जिनके विविध नाम रूप हैं। सृजन पालन संहार करने वाली शक्ति हैं,महा सरस्वती महालक्ष्मी महाकाली हैं, सर्व व्यापी चेतना हैं।________________________________दुर्गा सतशती के पंचम अध्य्याय में कहा गया है कि जब देवता , शुम्भ निशुम्भ राक्षसों से पराजित होकर गिरिराज हिमालय पर गए और वहाँ भगवती विष्णु माया की स्तुति करने लगे:"नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम।।"उस समय देवी पार्वती गंगाजी के जल में स्नान करने के लिए वहाँ आईं और देवों से पूँछा कि आप किसकी स्तुति कर रहे हैं? तब पार्वती जी के शरीरकोश से प्रकट हुई शिवा देवी बोलीं, यह मेरी ही स्तुति कर रहे हैं।◆पार्वती के शरीर से अम्बिका के प्रादुर्भाव से पार्वती का शरीर काले रंग का हो गया अतः वे हिमालय पर रहने वाली कालिका देवी के नाम से विख्यात हुईं।(दुर्गा सप्तशती पञ्चम अध्याय श्लोक ८८ )●देवी माँ के इन नौ नाम के बाद दुर्गा सप्तशती के अगले अर्गला पाठ में ग्यारह नाम वर्णित हैं :●१-जयन्ती २-मंगला ३-काली ४-भद्रकाली ५-कपालिनी ६-दुर्गा ७-क्षमा ८-शिवा ९-धात्री १०-स्वाहा ११-स्वधा .●दुर्गा सप्तशती में परिशिष्ट में दुर्गा के बत्तीस नाम भी दिए गए हैं।मेरे विचार से विगत कुछ दशकों से देवी माँ के कवच में वर्णित नाम मीडिया में कुछ अधिक ही चर्चित हो गए हैं जबकि जिस देवी कवच में ये नाम आरम्भ में आए हैं उस कवच का कोई उल्लेख मीडिया में नहीं देखा जाता है।●इन नौ नामों के चित्र भी गीता प्रेस गोरखपुर ने उपलब्ध कराए हैं इसलिए भी इन नौ नामों का मीडिया में चलन बढ़ा है।●जबकि नव रात्रि की देवी साधना में अथवा नित्य ही दुर्गा सप्तशती के समस्त या कुछ अध्यायों का जो पाठ करते हैं उनमें इन नौ नामों का अलग से उल्लेख नहीं किया जाता।कोई देवी साधक शरीर रक्षा के लिए नित्य कवच का पाठ करते हैं उनकी उपासना में ये नौ नाम पाठ आरम्भ में स्वतः ही आ जाते हैं। इन नौ नामों में कुछ के पुराण आख्यान भी हैं ।वस्तुतः साकार सगुण रूप आसानी से मन को ग्रहण होता है इसलिए त्रिदेव, गणेश, देवी माँ के सगुण रूप ही अधिक प्रचलित हैं।★★पार्वती कुंडलिनी शक्ति के रूप में:जब कुंडलिनी शक्ति का वर्णन किया जाता है तब इस शक्ति को छह चक्रों में से प्रथम मूलाधार चक्र में स्थित माना जाता है। रोचक तथ्य यह है कि इस मूलाधार चक्र के रक्षक पार्वती पुत्र गणेश जी हैं।◆इस षड़चक्र के आधार प्रथम चक्र में ही शक्ति का वास है और इसकी कृपा के लिए सर्वप्रथम गणेश उपासना आवश्यक है।गणपति अथर्व शीर्ष में भी रक्तवर्ण गणेश को मूलाधार में स्थित कहा गया है:त्वम मूलाधार स्थितोsसि नित्यं,त्वम शक्ति त्रयात्मकः त्वाम योगिनो ध्यायन्ति नित्यमयही बात इस कथा के रूप में प्रतीक रूप से वर्णित की गई है कि पार्वती जी ने अपने शरीर के उबटन से पुतला बना कर उसमें चेतना संचार कर द्वार रक्षा में नियुक्त किया ।शक्ति से चेतन इसी पुतले को बाद में गणेश कहा गया।★तंत्र की दृष्टि से देवी माँ को दस महाविद्याओं के रूप में वर्णित किया गया है : १ काली, २ तारा, ३ श्रीविद्या या त्रिपुर सुंदरी या ललिता, ४ भुवनेश्वरी, ५ त्रिपुर भैरवी,६ धूमावती, ७ छिन्नमस्ता, ८बगला, ९ मातंगी , १० कमला।देश के विभिन्न भागों में उपरोक्त दस महाविद्याओं में से प्रत्येक के सिद्ध मन्दिर भी हैं।इतना ही क्यों सारे भारत में देवी के 52 सिद्ध पीठ भी हैं । चित्र देखिए जो गूगल के सौजन्य से आगे प्रस्तुत है।★★इनमें से हिंगलाज पीठ व एक अन्य पीठ पाकिस्तान के बलूचिस्तान क्षेत्र में है जिसकी सेवा आज भी हिन्दू मुसलमान मिलकर करते हैं ।जबकि सुगंधा व एक अन्य बंगला देश में है।दुर्गा चालीसा में भी "हिंगलाज में तुमही भवानी" ऐसा उल्लेख है ।मेरी माताजी जब यह पढ़ती थीं तो समझ नहीं आता था कि इसका क्या अर्थ है।हिंगलाजदेवी मन्दिर।चित्र इण्डिया टाइम्स के सौजन्य सेजरा विचार कीजिए कि विभिन्न भूगोल भाषा व स्थानीय संस्कृति की विविधता के बाद भी इन 52 शक्तिपीठों ने हजारों वर्षों से भारत को कितने मजबूत सांस्कृतिक एकता के सूत्र में बांधे रखा है। भले ही राजनीतिक दृष्टि से उन क्षेत्रों में अलग अलग राज्य वंशों का शासन रहा।पर अब आज के सिक्कूलर उधार बुद्धिवादी सनातन धर्म के इस एकता मूलक प्रभाव के प्रति एलर्जिक हैं।अभी देवी माँ के सगुण रूप की चर्चा की ।जबकि वेद की दृष्टि से विचार करें तो देवी माँ को मूल प्रकृति और ब्रह्म स्वरूपणी ही कहा गया है। देखिए अथर्व वेद का देवी अथर्व शीर्षम जिसमें देवों के यह प्रश्न करने पर कि देवी आप कौन हैं तो देवी ने कहा:मैं ब्रह्म स्वरूपणी हूँ। मैं ही प्रकृति और पुरुषरूपात्मक जगत हूँ। ….अहम अखिलं जगत। मैं ही रुद्र और वसु हूँ.. विष्णु ब्रह्म देव और प्रजापति को धारण करती हूँ…यह सगुण निर्गुण निरूपण बहुत ही मनोरम है।इसका सदैव अर्थ समझते हुए अध्ययन मनन करते रहना चाहिए।● प्रश्न के उत्तर का सार यानिष्कर्ष:●शैल पुत्री यह नाम देवी माँ के नौ नामों में से एक प्रथम नाम है जो शैलजा पार्वती को संबोधित है। यह देवी कवच में आया है तथा इसका पुराण में कथाआख्यान भी है।●शैल पुत्री पार्वती ही आदिशक्ति रूप हैं और शिव की अर्द्धांगिनी हैं। ●शैल पुत्री पार्वती ही महा सरस्वती महा लक्ष्मी और महाकाली हैं। शैलपुत्री पार्वती ही दश महाविद्या हैं,सृजन पालन संहारशक्ति हैं और चेतना रूप से सवर्त्र व्याप्त हैं।या देवी सर्व भूतेषु मातृ रूपेण संस्थिता ।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।: षड़चक्र चित्र, देश के शक्ति पीठ स्थल चित्र गूगल से, शैलपुत्री गीता प्रेस की पुस्तक से, हिंगलाज india times से साभार।

नेहा जी प्रश्न के लिए धन्यवाद।

आइए देखते हैं देवी माँ का शैलपुत्री नाम कहाँ किस संदर्भ में आया है।

दुर्गा सप्तशती के पाठ के आरम्भ में पाठ की सिद्धि सफलता के लिए

 कवच ★कीलक और ★अर्गला

इन तीन का पाठ करने पर जोर दिया गया है।

इनमें से प्रथम देव्या कवचम के पाठ से साधक का सम्पूर्ण शरीर सभी प्रकार की बाधाओं से सुरक्षित हो जाता है।इसमें ५६ श्लोक हैं।

देवी चण्डिका को नमस्कार के उपरांत इन श्लोकों में से आरंभ के तीसरे चौथे और पांचवें श्लोक में जगदंबिका के नौ नाम दिए हैं:

  • प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्म चारिणी ।तृतीयं चंद्र घण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम।।
  • पञ्चमं स्कन्द मातेति षष्टम कात्यायनीति च।
  • सप्तम कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम ।।
  • नवमं सिद्धिदात्री च नव दुर्गा: प्रकीर्तिताः।

उपरोक्त नौ नामों में प्रथम नाम शैलपुत्री है। इसका अर्थ हुआ गिरिराज हिमालय की पुत्री पार्वती।

यह हिमालय की तपस्या से प्रसन्न होकर उनकी पुत्री रूप में प्रकट हुईं। इसकी पुराण व्याख्या से इतर अन्य तांत्रिक व्याख्याएं भी हैं।विभिन्न पुराणों में इसका आख्यान है। इसी प्रकार अन्य नामों की भी व्याख्या है।

_______________________________

★शैलपुत्री पार्वती शिव की अर्धांगिनी हैं , शिव शक्ति के इस संयुक्त स्वरूप की शाक्त शैव दर्शनों में कई तरह से व्याख्या है।

★यह शैलपुत्री पार्वती ही आदिशक्ति हैं जिनके विविध नाम रूप हैं। सृजन पालन संहार करने वाली शक्ति हैं,महा सरस्वती महालक्ष्मी महाकाली हैं, सर्व व्यापी चेतना हैं।

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दुर्गा सतशती के पंचम अध्य्याय में कहा गया है कि जब देवता , शुम्भ निशुम्भ राक्षसों से पराजित होकर गिरिराज हिमालय पर गए और वहाँ भगवती विष्णु माया की स्तुति करने लगे:

"नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।

नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम।।"

उस समय देवी पार्वती गंगाजी के जल में स्नान करने के लिए वहाँ आईं और देवों से पूँछा कि आप किसकी स्तुति कर रहे हैं? तब पार्वती जी के शरीरकोश से प्रकट हुई शिवा देवी बोलीं, यह मेरी ही स्तुति कर रहे हैं।

◆पार्वती के शरीर से अम्बिका के प्रादुर्भाव से पार्वती का शरीर काले रंग का हो गया अतः वे हिमालय पर रहने वाली कालिका देवी के नाम से विख्यात हुईं।(दुर्गा सप्तशती पञ्चम अध्याय श्लोक ८८ )

●देवी माँ के इन नौ नाम के बाद दुर्गा सप्तशती के अगले अर्गला पाठ में ग्यारह नाम वर्णित हैं :

●१-जयन्ती २-मंगला ३-काली ४-भद्रकाली ५-कपालिनी ६-दुर्गा ७-क्षमा ८-शिवा ९-धात्री १०-स्वाहा ११-स्वधा .

●दुर्गा सप्तशती में परिशिष्ट में दुर्गा के बत्तीस नाम भी दिए गए हैं।

  • मेरे विचार से विगत कुछ दशकों से देवी माँ के कवच में वर्णित नाम मीडिया में कुछ अधिक ही चर्चित हो गए हैं जबकि जिस देवी कवच में ये नाम आरम्भ में आए हैं उस कवच का कोई उल्लेख मीडिया में नहीं देखा जाता है।

●इन नौ नामों के चित्र भी गीता प्रेस गोरखपुर ने उपलब्ध कराए हैं इसलिए भी इन नौ नामों का मीडिया में चलन बढ़ा है।

●जबकि नव रात्रि की देवी साधना में अथवा नित्य ही दुर्गा सप्तशती के समस्त या कुछ अध्यायों का जो पाठ करते हैं उनमें इन नौ नामों का अलग से उल्लेख नहीं किया जाता।

कोई देवी साधक शरीर रक्षा के लिए नित्य कवच का पाठ करते हैं उनकी उपासना में ये नौ नाम पाठ आरम्भ में स्वतः ही आ जाते हैं। इन नौ नामों में कुछ के पुराण आख्यान भी हैं ।

वस्तुतः साकार सगुण रूप आसानी से मन को ग्रहण होता है इसलिए त्रिदेव, गणेश, देवी माँ के सगुण रूप ही अधिक प्रचलित हैं।

★★पार्वती कुंडलिनी शक्ति के रूप में:

जब कुंडलिनी शक्ति का वर्णन किया जाता है तब इस शक्ति को छह चक्रों में से प्रथम मूलाधार चक्र में स्थित माना जाता है। रोचक तथ्य यह है कि इस मूलाधार चक्र के रक्षक पार्वती पुत्र गणेश जी हैं।

◆इस षड़चक्र के आधार प्रथम चक्र में ही शक्ति का वास है और इसकी कृपा के लिए सर्वप्रथम गणेश उपासना आवश्यक है।

गणपति अथर्व शीर्ष में भी रक्तवर्ण गणेश को मूलाधार में स्थित कहा गया है:

त्वम मूलाधार स्थितोsसि नित्यं,त्वम शक्ति त्रयात्मकः त्वाम योगिनो ध्यायन्ति नित्यम

यही बात इस कथा के रूप में प्रतीक रूप से वर्णित की गई है कि पार्वती जी ने अपने शरीर के उबटन से पुतला बना कर उसमें चेतना संचार कर द्वार रक्षा में नियुक्त किया ।शक्ति से चेतन इसी पुतले को बाद में गणेश कहा गया।

★तंत्र की दृष्टि से देवी माँ को दस महाविद्याओं के रूप में वर्णित किया गया है : १ काली, २ तारा, ३ श्रीविद्या या त्रिपुर सुंदरी या ललिता, ४ भुवनेश्वरी, ५ त्रिपुर भैरवी,६ धूमावती, ७ छिन्नमस्ता, ८बगला, ९ मातंगी , १० कमला।

देश के विभिन्न भागों में उपरोक्त दस महाविद्याओं में से प्रत्येक के सिद्ध मन्दिर भी हैं।

इतना ही क्यों सारे भारत में देवी के 52 सिद्ध पीठ भी हैं । चित्र देखिए जो गूगल के सौजन्य से आगे प्रस्तुत है।

★★इनमें से हिंगलाज पीठ व एक अन्य पीठ पाकिस्तान के बलूचिस्तान क्षेत्र में है जिसकी सेवा आज भी हिन्दू मुसलमान मिलकर करते हैं ।जबकि सुगंधा व एक अन्य बंगला देश में है।दुर्गा चालीसा में भी "हिंगलाज में तुमही भवानी" ऐसा उल्लेख है ।मेरी माताजी जब यह पढ़ती थीं तो समझ नहीं आता था कि इसका क्या अर्थ है।

हिंगलाजदेवी मन्दिर।चित्र इण्डिया टाइम्स के सौजन्य से

जरा विचार कीजिए कि विभिन्न भूगोल भाषा व स्थानीय संस्कृति की विविधता के बाद भी इन 52 शक्तिपीठों ने हजारों वर्षों से भारत को कितने मजबूत सांस्कृतिक एकता के सूत्र में बांधे रखा है। भले ही राजनीतिक दृष्टि से उन क्षेत्रों में अलग अलग राज्य वंशों का शासन रहा।

पर अब आज के सिक्कूलर उधार बुद्धिवादी सनातन धर्म के इस एकता मूलक प्रभाव के प्रति एलर्जिक हैं।

अभी देवी माँ के सगुण रूप की चर्चा की ।जबकि वेद की दृष्टि से विचार करें तो देवी माँ को मूल प्रकृति और ब्रह्म स्वरूपणी ही कहा गया है। देखिए अथर्व वेद का देवी अथर्व शीर्षम जिसमें देवों के यह प्रश्न करने पर कि देवी आप कौन हैं तो देवी ने कहा:

  • मैं ब्रह्म स्वरूपणी हूँ। मैं ही प्रकृति और पुरुषरूपात्मक जगत हूँ। ….अहम अखिलं जगत। मैं ही रुद्र और वसु हूँ.. विष्णु ब्रह्म देव और प्रजापति को धारण करती हूँ…

यह सगुण निर्गुण निरूपण बहुत ही मनोरम है।इसका सदैव अर्थ समझते हुए अध्ययन मनन करते रहना चाहिए।

 प्रश्न के उत्तर का सार यानिष्कर्ष:

●शैल पुत्री यह नाम देवी माँ के नौ नामों में से एक प्रथम नाम है जो शैलजा पार्वती को संबोधित है। यह देवी कवच में आया है तथा इसका पुराण में कथाआख्यान भी है।●शैल पुत्री पार्वती ही आदिशक्ति रूप हैं और शिव की अर्द्धांगिनी हैं। ●शैल पुत्री पार्वती ही महा सरस्वती महा लक्ष्मी और महाकाली हैं। शैलपुत्री पार्वती ही दश महाविद्या हैं,सृजन पालन संहारशक्ति हैं और चेतना रूप से सवर्त्र व्याप्त हैं।

या देवी सर्व भूतेषु मातृ रूपेण संस्थिता ।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

: षड़चक्र चित्र, देश के शक्ति पीठ स्थल चित्र गूगल से, शैलपुत्री गीता प्रेस की पुस्तक से, हिंगलाज india times से साभार।

आरती कीजै हनुमान लला की|दुष्ट दलन रघुनाथ कला की||टेक||जाके बल से गिरवर काँपे|रोग दोष जाके निकट ना झाँके||अंजनि पुत्र महा बलदाई|संतन के प्रभु सदा सहाई||दे बीरा रघुनाथ पठाये|लंका जारि सिया सुधि लाये||लंका सो कोट समुद्र सी खाई|जात पवनसुत बार न लाई||लंका जारि असुर संहारे|सियाराम जी के काज सँवारे||लक्ष्मण मुर्छित पडे़ सकारे|आनि संजीवन प्राण उबारे||पैठि पाताल तोरि जम कारे|अहिरावन की भुजा उखारे||बायें भुजा असुर दल मारे|दहिने भुजा सब संत जन उबारे||सुर नर मुनि (जन) आरती उतारे|जै जै जै हनुमान उचारे||कचंन थार कपूर लौ छाई|आरती करत अंजना माई||जो हनुमान जी की आरती गावैं|बसि बैकुंठ परम पद पावैं||लंक विध्वंस किये रघुराई|तुलसीदास स्वामी किर्ती गाई||आरती कीजै हनुमान लला की|दुष्ट दलन रघुनाथ कला की||

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